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।। विचार।।
5 जून 2007-सलवा जुडूम की दूसरी
वर्षगांठ पर विशेष
यह तो स्वस्फूर्त सत्याग्रह है, फिर विरोध क्यों
.....?
तपेश जैन
यह
वहीं छत्तीसगढ़ है जहाँ नालंदा विश्वविद्यालय से
भी प्राचीन शिक्षा का कैन्द्र था जहाँ दस हजार से
भी ज्यादा बौद्ध भिक्षु शिक्षा प्राप्त करते थे,
जहां महाप्रतापी राजा जाजल्यदेव से ले कर महान
वैज्ञानिक आयुर्वेद और धर्मगुरु आदि शंकराचार्य ने
शिक्षा प्राप्त की। आज इस छत्तीसगढ़ में रहने को
कुछ विश्वविद्यालय हैं और यहाँ की 60 प्रतिशत से
भी ज्यादा आवादी अनपढ़ है। बहूमूल्य खनिज संपदा
हीरा, अलेक्जेड्राइट, कोरंडम, क्वार्टज,
लाइमस्टोन, टीन लौह सयस्क, डोलोमाइट, कोयला की
भरपूर खदान होने के बाद भी राज्य पिछड़ा हुआ है और
साल-सागौन, तेंदूपत्ता, आम, ईमली और महुआ के अलावा
कई वनोपज की भरपूर पैदावार के बाद भीवनवासी 75
प्रतिशत वनवासी बेहद गरीब हैं।
“अमीर
धरती के गरीब लोग”
ये उक्ति पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने भाषणों
में हर बार दुहराते रहे, उन्ही गरीब लोगों के
नुमाइंदों ने 5 जून 2005 को एक ऐसे अभियान की
शुरुआत की जिसने महातामा गांधी के सत्याग्रह को
याद दिलवा दिया। विश्वप्रसिद्ध बस्तर जहाँ आदिम
जाति की परंपराएं आज भी जीवित हैं, के फरसेगढ़
थाना क्षेत्र के छोटे से गाँव अंबेली में 5जून
2005 को करीब पाँच हजार आदिवासियों का जुडूम हुआ।
जुडूम गोंडी बोली का शब्द है जिसका अर्थ है
जुड़ना, वहीं सलवा का मतलब होता है शांति । ये सभा
पिछले 25 बरसों से बस्तर मं आतंक और हिंसा का
पर्याय बन चुके नक्सली आंदोलन की प्रितक्रिया थी।
हिंसा का प्रतिकार अहिंसा के साथ । इस आंदोलन ने
तेजी से लोकप्रियता हासिल की और देएखते
–देखते
दंतेवाड़ा जिला अब नारायणपुर और बीजापुर के भी 500
से ज्यादा गाँवों में इसकी लहर पहुँच गई है। इसके
चलते पहली बार
‘नो
मेंस लैण्ड’
जैसे अबूझमाड़ क्षेत्र के ग्राम चेरपाल में दस
हजार से भी ज्यादा आदिवासी जुड़े । अब तक सौ से भी
ज्यादा ग्राम सभाओं से ये शांति अभियान तमाम
प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद रुकने का नाम
नहीं ले रहा है।
गौरतलब है कि सलवा जुडूम अभियान इस बार पिर चर्चा
में है, जोर-शोर सेदेश भर के कथित जनवादी नक्सली
समर्थक नेताओं की गिरफ्तारी के विरोध में इस
आंदोलन को मानव अधिकार से जोड़ कर जोर-शोर से
हल्ला बोल दिए हैं। देश भर केतमाम आंदोलनकारियों
का जमावड़ा छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जुट
रहा है और एक ऐसे अभियान पर निशाना साधा जा रहा
है। जो हिंसा के खइलाफ स्वस्फूर्त खड़ा हुआ है।
यहाँ यह याद दिलाना लाजिमी होगा कि देश-दुनिया से
दूर बस्तर के आदिवासिोयं ने सन 1948 में हैदराबाद
निजाम द्वारा बस्तर को अपने राज्य में मिलाने के
लिए की गई सैनिक कार्यवाही का डर कर मुकाबला किया
था और अपनी स्वतंत्रता बरकरार रखी थी। ये इतिहास
ये बताता है कि वनवासियों में ये कूवत है कि वे
अगर ठान लें तो हजारों बलिदान के बाद भी हिम्मत
नहीं हारते। इसकी याद इसलिए आई कि नक्सलवादी सलवा
जुडूम अभियान से बौखला कर बस्तर अंचल में हिंसा का
ताण्डव मचा रहे हैं। केन्द्रीय गृहमंत्री के बयान
के अनुसार देश भर में हुई नक्सली हिंसा में
छत्तीसगढ़ अव्वल है और यहाँ कल हुई हत्यों के साठ
प्रतिशत हिस्सा इस राज्य का है। राज्य सरकार के
मुताबिक भी ससवा जुडूम के बाद बस्तर में जून 2005
से जून 2006 के बीच 272 नागरिकों की हत्याएं हुई,
वहीं 28 नक्सली लोग मारे गए । यानी अब तक अनुमानतः
दो साल में 600 से भी ज्यादा मौत घाट उतार दिए गए
हैं। सलवाजुडूम के घोर विरोधी मुख्यमंत्री अजीत
जोगी की माने तो बस्तर में सलवा जुडूम के चलते
बीते साल 272 नहीं बल्कि एक हजार से भी ज्यादा
हत्याएं हुई हैं और हजारों लोग बस्तर छोड़ आंध्र
प्रदेश पलायन कर चुके हैं। कांग्रेश नेता श्री
जोगी के अलावा कम्युनिस्ट पार्टियां औक कथित
जनवादी संगठन सलवा जुडूम के खिलाफ हैं। विरोध है
कि इस अभियान के चलते नक्सली लगातार हत्यां कर रहे
हैं। बड़े दुख की बात है कि कथित जनवादी नक्सली
हिंसा का विरोध करना छोड़ कर प्रतिकार में चल रहे
अहिंसक अभइयान के खिलाफ हैं। इससे उनका मुखौटा
जगजाहिर हो जाता है कि वे सशस्त्र जन आंदोलन
नक्सवाद का समर्थन करते हैं और गांधीवादी तरीके से
नक्सपंथ के खिलाफ संघर्ष कर रहे आदिवासियों का
विरोध।
सलवा जुडूम अभियान से बौखलाए नक्सलियों द्वारा
अधाधुंध गाँवों में हमले के बाद आदिवासियों को
अपनी जमीन छोड़ कर जंगल के बाहर निकलना पड़ा है।
सड़क के किनारे बसे गाँवों मंे करीब साठ हजार से
भी ज्यादा लोग तंबू तान कर रहे रहे हैं। वजह ये है
कि रात में नक्सली लूटपाट कर उनकी झोंपड़ियों जला
देते हैंऔर पशु उठा कर ले जातेहैं। ऐसी ही एक गाँव
भैरमगढ़ से करीब दस किलोमीटर दूर चिहका गाँव का
दौरा करने पर लेखक चरमपंथियों के आतंक से रुबरू
हुआ। सलवा जुडूम के बाद राहत शिविरों में सरकारी
सहायता में बेहद कमी है लेकिन क्या करें, कहाँ
जाएं और अब तो राहत शइविर जहाँ सुरक्षा सरकार की
जिम्मेदारी है वहाँ भी नक्सली दुःसाहस कर हमला कर
रहे हैं। 16-17 जुलाई 2006 की दरम्यानी रात
एर्राबोर राहत शिलिर पर प्रतिबंधित भारतीय
कम्युनिस्ट पार्टी माओवादीको दण्डकारण्य जोनल
कमेटी ने घेर कर आग लगाने के बाद जबर्दस्त
गोलीबारी की जिसमें दो बच्चों सहित 33
महिला-पुरुष हलाक हो गए । इस हमनले के बाद बड़ शान
से मीडिया के सामने जोनल कमेटी के सचिव कोसा और
प्रवक्ता गुड़सा उसेंडी ने इसकी जवाबदारी लेते हुए
सलवा जुडूम को बंद करने का फरमान जारी किया ।
लेकिन सलवा जुडूम अभइयान कोई भारतीय जनता पार्टी
या विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कांग्रेस विधायक
महेंद्र कर्मा का छोड़ा हुआ अभियान नहीं है जो बंद
हो जाएगा। गृहमंत्री रामविचार नेताम के अनुसार
राहत शिविरों में पहले एक साल 30 जून 2006 तक
मात्र पाँच करोड़ आठ लाख 84 हजार 227 रुपए का
सालाना बजट में ये राशइ ऊंट के मुँह में जीरे के
समान ही है। नगम्य राशइ के खर्च से यह अंदाजा
लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार कहीं ना कहीं
दबाव में है और राहत शइविरों में रहने वाले
भोले-भाले लोगों के भोलेपन का नाजायज फायदा उठा
रही है। वहीं आंध्रप्रदेश में नक्सली नेता माधव और
महाराष्ट्र में गढ़िचरौली के जोनल कमांडर विकास की
बैमौत मारे जाने की घटना के बाद छत्तीसगढ़ मेंअपना
अस्तित्व बचाने में जुटे नक्सलियों पर गृहमंत्री
देशद्रोही की उपमा दे कर शब्दबाण चला रहे हैं,
जबकि जरूरत ग्राउंड हंट की हा। यह सरकार की
जवाबदेही है कि वह जैसे को तैसा का जवाब दे। अभि
तो बिना राजनैतिक महत्वकांक्षा के मुख्यमंत्री डॉ.
रमन सिंह केवल बयानों से ही सलवा जुडूम की वाहवाही
लूट रहे हैं। असल नायक तो संघर्ष कर रहे हैं लेकिन
ये लड़ाई परिणाम तक जरूर पहुँचेगी और इसे पहुँचाना
भी चाहिए क्योंकि यही इंसाफ का तकाजा है।
  
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