सलवा-जुडूम

 बस्तर के आदिजनों का स्वः स्फूर्त सत्याग्रह

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।। विचार।।

 

उजालों के सौदागर

प्रभाकर चौबे


     वे लोग जो इस लोकतंत्र को कायम रखने के लिए समर्थित हैं और यथास्थितिवादी हैं, वे तो हिंसक घटनाओं की निंदा करते ही हैं, लेकिन वे भी जो क्रांति के दर्शन और व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव के विचार को मानते हैं, वे भी ऐसी हिंसक घटनाओं का न केवल समर्थन नहीं करते हैं, न केवल इस पर विश्वास नहीं करते वरन इसकी निंदा करते हैं। क्रांति पर विश्वास करने वाले, उस दिशा में जनचेतना फैलाने ये काम में लगे जन यह जानते हैं कि जनता के एक साथ उठ खड़े होने पर ही क्रांति होती है। जनता का समर्थन जरूरी है। नेपाल में अंतत: लोकतांत्रिक दलों ने व्यवस्था में पूर्ण परिवर्तन के लिए माओवादियों का समर्थन लिया और जब जनता लामबंद हुई तो ऐसा परिवर्तन आया कि वहां राजसत्ता खत्म कर दी गई। वहां लोकतंत्र आया। वहां हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर धर्म निरपेक्षता सरकार को स्वीकार करना पड़ा। राजा के अधिकार छिने। फौज रखने का उसका अधिकार छीन लिया गया। इसलिए क्रांति में हिंसा के लिए स्थान नहीं है। हर नक्सली हिंसा के बाद जो लोग आवाज लगाते हैं कि क्रांति की बात करने वाले बुध्दिजीवी और मानवाधिकार के लिए आवाज उठाने वाले एक्टिविस्ट अब कहां हैं, वे क्रांति के दर्शन को जनता से ओझल करने का काम करते हैं। परिवर्तन पर और बेहतर जिंदगी तथा इस लोकतंत्र में मानवीय गरिमा की बात करने वालों ने, तथा उसके लिए संघर्ष करने वालों ने ऐसी हिंसक घटनाओं की हमेशा निंदा की है, लेकिन वे तार्किक तरीके से यह सवाल भी उठाते हैं कि इस स्थिति के उपजने के कारणों की भी पड़ताल की जाए। लेकिन यथास्थितिवादी पड़ताल की जरूरत से हमेशा बचते हैं। कार्य-कारण की समीक्षा और पड़ताल के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त होना होता है और परिवर्तन के लिए अपनी सुविधाओं का बलिदान करना होता है। इनके छिनने का 'भय' यथास्थितिवादियों को कुतर्क व गलत कारणों को गढ़ने का तरीका सिखाता रहता है। किसी भी बुध्दिजीवी या लेखक ने नक्सली हिंसा अथवा सांप्रदायिकता का समर्थन नहीं किया। लेकिन यह जरूर कहते रहे हैं, कहते हैं कि इसके पैदा होने के कारण इसी व्यवस्था में हैं। इस व्यवस्था की छानबीन की जाए। खंगाला जाए।

 

व्यवस्था के पास विधायिका है जो कानून बनाती है, कार्यपालिका है, न्याय है, न्यायविदों और कानूनविदों की लंबी कतार है, फौज है, पुलिस है और व्यवस्था से लाभ उठाने वाले दलालों का ताकतवर समूह है। मीडिया उसका है। जनता की ओर से और विशेषकर आदिवासियों के द्वारा बार-बार यह पूछा जाता रहा है कि आजादी के बाद से ही आदिवासियों के विकास के लिए, उनकी उन्नति के लिए करोड़ों रुपए आए, दिए गए, फिर भी विकास क्यों नहीं हुआ। कहां बिला गए करोड़ों रुपए। किनके पेट में समा गया। स्व. राजीव गांधी का यह कथन न भी दोहराएं कि विकास के लिए भेजे गए एक रुपए में से नीचे तक केवल पंद्रह पैसे पहुंचते हैं। इस कथन को बार-बार दोहराया जाता है। लेकिन जनता इसे महसूस करती रही है।

 

बस्तर में आदिवासियों के विकास के लिए इन साठ सालों में जो धन आया उसके पाई-पाई का हिसाब उन्हें दिया जाना चाहिए। वहां किनका विकास हुआ। बड़े-बड़े जंगल चोरों की निकल पड़ी। आदिवासियों के बच्चों के लिए सहायता के रूप में आया दलिया, दूध, पौष्टिक अहार खुले बाजार में बिकते रहा। आदिवासियों के बच्चों के हास्टलों के लिए खरीदे गए कंबल, गद्दे-तकिया, बर्तनों में कितनी दलाली खाई गई। उनकी छात्रवृत्ति की कितनी राशि गड़प ली गई। सड़कों, पुलों के निर्माण में वास्तविक खर्च कितना हुआ? सड़कें बनी नहीं, कागजों में बनी। स्वास्थ्य सेवाओं का क्या हाल कर रखा है। आज भी मौसमी बीमारी से हजारों आदिवासी पीड़ित होते हैं और सैकड़ों काल के ग्रास बनते हैं। मलेरिया, डायरिया, पेचिस तक की दवाएं उपलब्ध नहीं। शुध्द पेयजल देने की योजना का कितना धन बिचौलियों ने गटक लिया। इन सबका हिसाब कहां है। भूमि सुधार, जमीन का बटवारा क्यों नहीं लागू हुआ।

शिक्षा का और संपूर्ण साक्षरता का क्या हाल कर दिया है। दूर जाने की जरूरत नहीं, अभी दो साल पहले राजीव गांधी शिक्षा मिशन के तहत साक्षरता अभियान में खरीदी में कितने घपले किए गए- दस रुपए का मटका और बिल पचास रुपए का। दस रुपए के गिलास की कीमत चालीस रुपए लिखी गई। मग्गा, मटका, बाल्टी आदि उपकरण खरीदी में कितना भ्रष्टाचार किया गया, यह अखबारों में छपा। राशन में भ्रष्टाचार। कनकी कांड। धान खरीदी में भ्रष्टाचार। डामर घोटाला कांड। वाहन खरीदी में भ्रष्टाचार। कालातीत दवाइयां खरीदने के मामले। शिक्षाकर्मी भर्ती में लेनदेन के आरोप। कम गुणवत्ता की सड़कों का निर्माण। और तो और अदरक की खेती के नाम पर किसानों के साथ लूट और धोखा- कितना गिनाएं। कहा जाता है कि इनकी जांच की जाती है। दोषियों को नहीं बख्शा जाता है। ऐसे वाक्य पानी पड़ी धान की तरह सड़ गए, किसी काम के नहीं। और जांच कितने दिन चलती है। चारा घोटाला कब हुआ। कब फैसला होगा। लूट, हत्या, हिंसा के आरोपी सांसद और विधायक बन रहे हैं- सालों मुकदमा चलता है।

 

सेज के नाम पर किसानों की जमीन ली जा रही है। सब्जी, फल, अनाज में बड़ी कंपनियां आ गई हैं- छोटे कारोबारियों का रोजगार छिन रहा है। रेलवे स्टेशनों में ठेले लगाकर माल बेचने वालों को बेदखल कर दिया गया, भगा दिया गया। यहां बड़े ठेकेदार काबिज करा दिए गए। छोटों व गरीबों की रोजी-रोटी छीनने का षड़यंत्र चल रहा है और यह सब विकास के नाम पर चल रहा है। कहां जाएंगे ये छोटे-मोटे काम-धंधा करने वाले। देश की एक अरब की आबादी का हर व्यक्ति क्या मॉल, मल्टीप्लेक्स, फाईवस्टार और इंटरनेट में नौकरी-रोजगार पा सकता है। जो इसके बाहर हैं उनकी रोटी छीनने का कुत्सित कार्य बंद क्यों नहीं किया जाता। देश में बेरोजगारों की भीड़ लग रही है- वे काम मांग रहे हैं। लेकिन ऐसी आर्थिक उदारीकरण की नीति चलाई जा रही है कि वे जो कामकर रहे हैं, वह उससे भी वे वंचित हो रहे हैं। दिन-रात भजनों, प्रवचनों, उत्सवों का तांता लगाकर व्यवस्था समझती है कि युवक अपना दुखड़ा भूल जाएंगे। लेकिन आज युवा वर्ग भारी प्रतिस्पध्र्दा में है। अनिश्चितता के कारण उपजा रोष भी है और जो वंचित हैं, वे गुस्से में हैं। आर्थिक असमानता, विषमता के कारण सामाजिक संगठन तार-तार हो रहा है। संवेदनाएं, सद्भाव, विवेक के लिए अवसर ही नहीं बच रहा। इनमें भी आदिवासियों की स्थिति और भी खराब है। उनकी आर्थिक दुर्दशा के लिए जवाबदार जो हैं, उन्हें चिन्हित करने से ऐसी संस्थाएं परहेज करती हैं।

 

आदिवासियों को गरिमामय बराबरी का दर्जा देने के काम इतना पिछड़ गया है कि इनमें असंतोष फैला है। आदिवासी या कोई भी समाज कोई कर्मकांड न जाने तो कोई नुकसान नहीं हो जाता, लेकिन विषमता से और गैरबराबरी से भरे समाज के बीच वह खुद को घोर उपेक्षित पाता है और ऐसी समझ विद्रोह को जन्म देती है। इसका इलाज है समतावादी समाज-आर्थिक रास्ते पर चलने सबको बराबरी का हक। असंतोष को दूर नहीं किया गया तो अराजकता फैलेगी ही। आजादी के लड़ाई के दौरान सुभद्राकुमारी चौहान ने ''झांसी की रानी'' कविता लिखी। उसकी एक पंक्ति है ''बूढ़े भारत में आई फिर से नई जवानी थी''

 

आजादी से पहले भारत बूढ़ा था। आजादी के बाद जवान हो गया है-उसका अपना संविधान है। उसका अपना लोकतंत्र है। उसमें जोश है। नई चेतना जागी है। और अब वह बंधुवा बनकर नहीं रहेगा। व्यवस्था के केंद्र में और उसके इर्द-गिर्द घेरा डाले बैठे-खड़े-लेटे-दंडवत होते लोग इस पर बात नहीं करते। इसलिए उन्हें दुरुस्त करने देश में जगह-जगह कई तरीके से कई रूपों में प्रतिकार हो रहा है। वे समझें कि भारत आजादी के बाद जवान हुआ है। और अब लूट-खसोट को कैसे सहे जबकि इसने औपनिवेशिक सत्ता को खदेड़ा। व्यवस्था के कर्ताधर्ता समझें। लेकिन कैसे समझें, कैसे समझाया जाए। मुक्तिबोध कहते हैं-
जनता को ढोर समझ
ढोरों की पीठ भरे
घावों में चोंच मगर
रक्त-भोज, मांस-भोज
करते हुए गर्दन मटकाते दर्प-भर कौंओं-सा
भूखी अस्ति-पंजर शेष
नित्य मार खाती-सी
रंभाती हुई अकुलाती दर्द भरी
दीन मलिन गौओं-सा

व्यवस्था में बैठे उजाले के सौदागरों ने विकास का सारा उजाला गोदामों में डम्प कर रखा है और अपनों को ही उजाला बेच रहे हैं।

 

(देशबंधु की वेबसाइट पर प्रकाशित आलेख)

 

 

संपर्कः लोकमान्य सद्भावना समिति, जैनबाड़ा, बैजनाथ पारा, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत-492001

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