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।। विचार।।
नक्सलवाद का विकृत चेहरा
जयप्रकाश मानस
नक्सलवाद भटका हुआ आंदोलन है । यह अधैर्य की उपज
है । इसकी बस्ती में मानवता की कोई बयार नहीं बहती
। यह पशुयुग की वापसी का उपक्रम है जिसके मूल में
है हिंसा और सिर्फ हिंसा। यह जन के लुटे हुए सत्व
के लिए नहीं अपितु हितनिष्ट ताकतों की राजनैतिक
सत्ता के लिए संघर्ष मात्र है, जिन्हें वस्तुतः
जनता के कल्याण से कोई वास्ता नहीं है । तथाकथित
समाजवादी मूल लक्ष्यों की साधना से न अब किसी
कमांडर को लेना देना है न वैचारिक सूत्रधारों को ।
वह पथभ्रष्ट और सिरफिरे लोगों की राक्षसी
प्रवृत्तियों और हिंसक गतिविधियों का दूसरा नाम है
। रहे होंगे उसके अनुयायी कभी सताये हुए लोगों के
देवता, अब तो उनका दामन आदिवासियों, गरीब और अहसाय
लोगों के खून से रंग चुका है । उसके मेनोफेस्टो
में अब
दीन-दुखी, पीडित-दलित, मारे-सताये हुए पारंपरिक
रूप से शोषित समाज के प्रति न हमदर्दी की इबारत
है, न ही समानता मूलक मूल्यों की स्थापना और
विषमतावादी प्रवृतियों की समाप्ति के लिए लेशमात्र
संकल्प शेष बचा है । वह स्वयं में शोषण का
भयानकतम् और नया संस्करण बन चुका है ।
वह अभावग्रस्त एवं सहज, सरल लोगों के
मन-शोषण नहीं बल्कि तन-शोषण का भी जंगली अंधेरा है
। एक मतलब में नक्सलवाद शोषितों के खिलाफ हिंसक
शोषकों का नहीं दिखाई देने वाला शोषण है । कम से
कम छत्तीसगढ़ के दर्पण में नक्सलवाद का तो यही
विकृत चेहरा नज़र आता है।
(संपूर्ण लेख)
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