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।।इतिहास।।
सलवा जुडूम अभियान का सूत्रपात
सलवा जुडूम : कब क्या हुआ
नक्सलियों के खिलाफ क्रांति की शुरूआत बस्तर के
आदिवासियों ने
5 जून 2005
को की। इस दिन फरसेगढ़ थाना
क्षेत्र के ग्राम अंबेली में आदिवासियों की पहली
बैठक हुई। इस बैठक में पांच संघम सदस्यों को सजा
दी गई। इसके बाद बैठकों का सिलसिला ही चल पड़ा।
कुटरू, कुदमा,
अट्टावली,
रानीबोदली, तालमेंटरी,
दरे और मारवाड़ा में नक्सलियों के
खिलाफ ग्रामीणों ने आवाज उठाई। 5
जून के बाद 18-19
जून को फरसेगढ़ थाना क्षेत्र के
ग्राम तालमेंद्री,
कोतरापाल और जांगला व 48
गांवों के करीब पांच हजार ग्रामीण एकत्र हुए।
ग्रामीणों की इस बैठक में दो नक्सली भी भेष बदलकर
बैठे हुए थे जिन्हें ग्रामीणों ने पहचान लिया और
उनकी इतनी पिटाई की कि मौके पर ही उनकी मौत हो गई।
अपने साथियों की ग्रामीणों द्वारा की गई हत्या
नक्सलियों को सहन नहीं हुई और उन्होंने सैकड़ों
संख्या में 20 जून को
ग्रामीणों की उसी बैठक में हमला बोल दिया।
ग्रामीणों के समूह पर अचानक नक्सलियों द्वारा की
गई गोलीबारी से 8
ग्रामीणों की मौके पर ही मौत हो गई जबकि 45
को बंधक बनाकर नक्सली अपने साथ ले
गए। इनमें से चार की हत्या कर उनके शव जंगल में ही
फेंक दिए गए थे। इस प्रकार इस बैठक में ग्रामीणओं
को अपने 12 साथियों की जान
की आहुति देनी पड़ी। इस हमले के बाद नक्सली शायद
सोच रहे होंगे कि ग्रामीण अब शांत बैठ जाएंगे,
पर ऐसा हुआ नहीं,
ग्रामीणों के हौसले और भी बढ़ गए।
नक्सली उनके इस बढ़े हुए हौसले से बौखला गे हैं।
यही कारण है कि वे मौका मिलते ही उन पर कहर बनकर
टूट रहे हैं। मगर गजब के जीवट हैं ये तीर-धनुषधारी
आदिवासी जंग का ऐलन कर चुके हैं तो अब पीछे
हटेंगे नहीं, भले ही उनकी
जान क्यों न चली जाए।
इसके बाद
22 जून को भैरमगढ़ क्षेत्र में
बैठक हुई। इस बैठक में बोदली,
मारवाड़ा,
नेमेड़, कुटरू,
सिंगाचल,
भैरमगढ़ और सतवा सहित 40
गांवों के करीब कई हजार ग्रामीण तीर-धनुष के साथ
एकत्र हुए। बैठक में नक्सली घुसपैठ न कर सके इसलिए
युवक पहरे पर चारों ओर तैनात थे। उन्होंने शपथ ली
कि वे बस्तर की परंपरा संस्कृति को नष्ट करने तथा
उनका लगातार शोषण करने वाले नक्सलियों से बस्तर को
मुक्त करके ही दम लेंगे,
मर जाएंगे पर अपनी अगली पीढ़ी को उनसे मुक्ति
दिलाते ही रहेंगे। यह समूचा दृश्य आजादी के आंदोलन
में कम नहीं था। पश्चात 27
जून को नेलगुड़ा और भैरमगढ़ के पास 22
गांवों के लोगों की बैठक हुई इस
बैठक में नक्सलियों ने नारा दिया कि अपनी लड़ाई हम
खुद लड़ेंगे। क्षेत्र में यह नक्सलियों के खिलाफ
16वीं बैठक थी जिसमें नेता
प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा भी उपस्थित थे। इस बैठक
में ही आंदोलन को 'सलवा
जुडूम' नाम भी दिया गया।
इसी दिन कांकेर जिले के परलकोट क्षेत्र में भी
नक्सलियों के खिलाफ जनजागरण अभियान की शुरूआत
कलेक्टर डॉ. राजू की उपस्थिति में हुई। 29
जून को दक्षिण बस्तर के धुर
नक्सली क्षेत्र कुटरू में हुई बैठक में लगभग
55 गांवों के पांच हजार से
भी ज्यादा ग्रामीणों ने ----की। इस दिन उन्होंने
संकल्प लिया कि कोटा से अंबिकापुर तक पूरे
छत्तीसगढ़ से नक्सलियों को उखाड़ फेकेंगे। अब
नक्सलियों के खिलाफ आदिवासियों की बैठक ऐसे खाली
नहीं रही है। चाहे जैसे नक्सलियों तक ग्रामीणों की
बैठकों की जानकारी पहुंच जाती है और इसके पहले की
नक्सली रात में धावा बोलकर जनजागरण अभियान के बड़े
लोगों को आतंकित करने कत्लेआम करने लगे हैं। इस
प्रकार के हमलों में अब तक 45
से भी ज्यादा लोग मारे जा चुके
हैं। लेकिन ग्रामीणों के भी हौसले पस्त हुए हैं।
उन्होंने भी नक्सलियों को मौत के घाट उतारना शुरू
कर दिया है। कुटरू क्षेत्र में ही करीब पांच
नक्सली मारे गए हैं,
जिन्हें ग्रामीणों के समूह ने मौत की सजा दी है।
इसके अतिरिक्त लगभग 50
संघम सदस्यों को ग्रामीणों ने बंधक
बना रखा था।
बहरहाल बस्तर में नक्सलियों के खिलाफ शुरू हुई
क्रांति की यह आग अब धीरे-धीरे फैलने लगी है।
दक्षिण बस्तर के ही सुकमा और नारायणपुर पुलिस जिला
बिजली,
पालकी,
महका, खड़कागांव और
केरलापाल के लोगों ने भी मोर्चा खोल दिया है। इसके
बाद तो मानो जन आंदोलन का सिलसिला ही चल पड़ा है।
इसी तारतम्य में छह चुलाई को तोएनार के जंगल में
45 गांवों के पांच हजार
ग्रामीण एकत्र हुए। आदिवासियों के इस जन आंदोलन को
संबोधित कर लौट रहे नेता प्रतिपक्ष दंतेवाड़ा जिले
के प्रभारी मंत्री केदार कश्यप के काफिले को
निशाना बनाकर नक्सलियों ने हमला बोला। लेकिन
सुरक्षा व्यवस्था के कारण उनका हमला खाली गया
प्रतिपक्ष महेन्द्र कर्मा स्वयं भी दो बार नक्सली
क्षेत्रों में पदयात्रा कर चुके हैं। नक्सल विरोधी
आंदोलन में सहभागिता की कीमत भी श्री कर्मा को
चुकानी पड़ी है। उनके ग्राम फरसेपाल में पांच सौ से
भी अधिक नक्सलियों ने हमला बोलकर उनके रिश्ते में
बड़े भाई सुकू कर्मा की हत्या कर दी और उनके घर में
लूटपाट की। इस हत्या के बाद भी श्री कर्मा का
मनोबल नहीं टूटा है। इसी क्रम में पुलिस की
कार्रवाई भी नक्सलियों के खिलाफ तेज हुई है। इस
अभियान के दौरान ही दर्जनों नक्सलियों को
ग्रामीणों ने बंदी बनाया है वहीं उन्हें सहयोग
करने वाले लगभग सौ संघम सदस्य भी पुलिस के हत्थे
चढ़े हैं।
(हरि ठाकुर
स्मारक संस्थान द्वारा प्रचारीत 'सलवा
जुडूम'
से साकार)
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