सलवा-जुडूम

 बस्तर के आदिजनों का स्वः स्फूर्त सत्याग्रह

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सलवा जुडूम :  सूत्रपात

लवा जुडूम यह गोंड़ी आदिवासी भाषा का शब्द है। इस का अर्थ है शांति स्थापित करना। आदिवासी क्षेत्र में शांत स्थापित करना यही सलवा जुडूम का उद्देश्य है। आदिवासियों को इस अभियान में शामिल कर शांति को चिरस्थायी बनाना यह भी उद्देश्य है। इस अभियान की शुरूआत 15 वर्ष पहले शांतिपूर्ण पध्दति से की गई। वनवासी-आदिवासियों से मिलकर, उनकी सभाओं में जनजागरण के माध्यम से यह अभियान शुरू किया गया। इस अभियान द्वारा हर गांव की सुरक्षा समिति बनाई जाती है तथा गांव के सुरक्षा की स्वयंपूर्ण रचना बनाई जाती है। कोई प्रचार किए बिना ही इस अभियान की व्याप्ती बढ़ती गई। नक्सलियों का प्रभाव सब से अधिक जिस क्षेत्र में है, ऐसे भैरमगढ़, बीजापुर क्षेत्र में इस अभियान का जोर ज्यादा दिखाई ेता है। इस अभियान को चलाने वालों का यही प्रयास है कि अभियान की प्ररणा सकारात्मक हो। यही कारण है कि अभियान स्थायी रूप में चल रहा है। नक्सलियों को गांव में स्थान नहीं देने का प्रण करना आसान नहीं है किन्तु यह सामुहिक मानसिकता धीरे-धीरे बन सकती है। गांव की सामुहिक मानसिकता की अपनी ताकत होती है यही इस अभियान ने स्पष्ट किया है।

 

दिनांक 18 मई 2005 के दिन तालमहेंद्री में सलवा जुडूम की बड़ी सभा बुलाई गई थी। इस सभा में नक्सलियों ने हमला किया। नक्सलियों की गोलाबारी का सामना आदिवासियों ने तीर-कमान से किया। कुछ लोगों की जानें गईं और इसी से सलवा जुडूम अभियान की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। दिनांक 5 जून, 2005 के दिन फरिसगुड क्षेत्र के अंबेली गांव में आदिवासियों की सभा हो रही थी। इस सभा में संघम के पांच सदस्यों को सजा सुनाई गई। इसके पश्चात आदिवासियों की ऐसी सभाएं हर गांव में होती रही। 18, 19 जून को इसी क्षेत्र में तालमहेंद्री, कोतरापाल, जांगला आदि गांवों में आसपड़ोस के 48 गांवों में से 5000 आदिवासी एकत्रित हुए। इस सभा में दो नक्सली छुपकर शामिल हुए थे। जब यह बात सामने आयी तो आदिवासियों ने इन दोनों को वहीं पर मार डाला। दो साथियों की हत्या से संप्त नक्सलियों ने 20 जून को इस गांव पर हमला किया और गोलीबारी की। गोलीबारी में 8 आदिवासी मारे गए। 45 आदिवासियों को नक्सलियों ने बंदी बनाया। इनमें चार लोगों को मारकर उनके शव जंगल में फेंक दिए गए। नक्सलियों के प्रभाव का नजरअंदाज करते हुए 29 जून, 2005 के दिन दक्षिण बस्तर के कुटूर क्षेत्र के 55 गांवों से 5000 आदिवासी एक सभा में सम्मिलित हुए। इस क्षेत्र से नक्सलियों को खदेड़ने का निर्णय सभा में किया गया।

 

गांवों में होने वाले नक्सली विरोधी सभाओं में शामिल आदिवासियों पर नक्सलियों ने कई बार हमले किए हैं। ऐसे हमलों में लगभग 45 आदिवासियों की जानें गई हैं। नक्सलियों के खिलाफ चल रहे इस आंदोलन में राज्टय के विपक्ष दल के नेता महेन्द्र कर्मा सक्रीय रूप से शामिल हैं। यही कारण है कि, नक्सलियों ने श्री कर्मा के फरसेपाल गांव पर हमला कर उन के भाई सुकू कर्मा की हत्या कर दी। गोंड़ जनजाति के लोग प्राय: शांतिप्रिय हैं। किन्तु, नक्सलियों की हिंसा के प्रतिरोध के लिए अब बीजापुर भैरमगढ़ में सलवा जुडूम का जोर बढ़ रहा है। इस अभियान को किसी एक राजकीय दल या नेता का नेतृत्व नहीं है और यही इस अभियान की ताकत है। यही नहीं मायने में एक लोकअभियान है। छत्तीसगढ़ विधानसभा में श्री महेंद्र कर्मा विपक्ष के नेता हैं। उनके साथ साथ सत्ताधारी पक्ष का भी सलवा जुडूम को संपूर्ण समर्थन हासिल है। किसी एक दिन, किसी गांव में सलवा जुडूम की सभा का ऐलान किया जाता है और आस पड़ोस के क्षेत्र में आदिवासी अपना तीर कमान लेकर कई मील का रास्ता चलकर सभा के लिए हजारों की संख्या में उपस्थित हो जाते हैं। इस प्रकार का प्रभाव सलवा जुडूम ने बनाया है। मुसलाधार बारिश में सलवा जुडूम के लिए 10 हजार से अधिक आदिवासी एकत्रित होते हैं। आज तक इस प्रकार 48 सभाएं अलग-अलग गांवों में की गई है। 150 से अधिक गांवों में सुरक्षा समितियां स्थापित की गई है।

 

जैसे-जैसे सलवा जुडूम अभियान की व्याप्ति बढ़ रही है, नक्सलियों के प्रभाव में आए युवा-युवती भी सलवा जुडूम की ओर आकर्षित हो रहे हैं। सलवा जुडूम की हर सभा में नक्सली संघम के युवक आत्मसमर्पण करते हैं। सरकार ने भी सलवा जुडूम की सभाएं तथा पदयात्राओं को सुरक्षा प्रदान करने का निर्णय लिया है। सलवा जुडूम में अधिकतम लोग शामिल हो, इस अभियान की ताकत बढ़े, इस उद्देश्य से स्वयं मुख्यमंत्री तथा उनके मंत्रिगण भी सलवा जुडूम की कुछ रैलियों में सम्मिलित हुए थे।

( रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी संस्था की रिपोर्ट)

 

 

संपर्कः लोकमान्य सद्भावना समिति, जैनबाड़ा, बैजनाथ पारा, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत-492001

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