सलवा-जुडूम

 बस्तर के आदिजनों का स्वः स्फूर्त सत्याग्रह

मुख्यपृष्ठ

हिंदी संस्करण

अंगरेज़ी संस्करण

संपर्क

हमारे बारे में

।।हलचल।।

 

सलवा जुड़ूम डाक्युमेंट्री फिल्म की समीक्षा गोष्ठी आयोजित

 

नक्सली समस्या के हल के लिए पायलट प्रोजेक्ट नहीं

 

रायपुर । छत्तीसगढ़ का संक्षिप्त रुप अंग्रेजी में सी.जी. है यानी चारागाह। अफसरों और नेताओं   ने इस प्रदेश में लूट-खसोट की मुफीद जगह बना ली है।  स्वःस्फूर्त आदिवासियों के "सलवा  जुड़ुम" शांति  अभियान को भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है, इसके लिए शासन के पास कोई  पायलेट प्रोजेक्ट तक नहीं  है। ये विचार लोकमान्य सद्भावना समिति द्वारा निर्मित "सलवा  जुड़ूम " डाक्यूमेंट्री फिल्म की समीक्षा गोष्ठी में वक्ताओं ने व्यक्त किए। हिंसा के खिलाफ अहिसां का संदेश देने वाली फिल्म सलवा जुड़ुम का   निर्देशन तपेश जैन ने किया है।  इसमें गीत-संगीत जफर रजा़ का है और गायक है चंदन बांधे। ईरा फिल्म के बैनर तले इसका प्रोडक्शन किया गया है और जिसे समीक्षा गोष्ठी के साथ ही प्रेस को   जारी किया गया  है। छत्तीसगढ़  भाषा में उद्बोधन देते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. जे.आर. सोनी  ने कहा कि नक्सली  मन ह   रक्षक से भक्षक बन गे हे। बिजली  काटे के अलवा बम विस्फोट कर  मनखे  मन   मां दहशत पैदा  कर-दिए हे।  येही करतूत से जनवादी चेहरा हा बेनकाब होगे हे। साहित्यकार डॉं महेन्द्र ठाकुर ने नक्सली समस्या को राष्ट्रीय समस्या बताते हुए   डाक्यमेट्री  फिल्म की आलोचना की  कि  इसमें अगर नक्सली अत्याचार का नाट्य रुपान्तरण होता तो बेहतर होता। आखिर नक्सली   कैसे मसीहा से अत्याचारी  बन गए इस पर भी  निगाह  रखनी थी। अभी   शिविरों में रह रहे आदिवासियों की व्यथा-कथा को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए था।

संगोष्ठी में डॉ. सुधीर शर्मा ने कहा कि छत्तीसगढ़ का संक्षित रुप होता है। सी.जी. जिसका अर्थ   है चारागाह । आज जरूरत है कि कैसे अफ़सरों और नेताओं से अपने राज्य को बचाया जाए। सलवा जुड़ूम आदिवासियों का एक ऐतिहासिक आंदोलन बन चुका है। इसलिए बहुत जरूरी हो जाता है कि पढ़े लिखे शातिर सफेद लोग अब आगे राज्य को न लूटें। इसकी आड़ में स्वार्थ की पूर्ति ना कर सके। आज पूरे देश में एन.जी.ओ. को नाम पर पढ़े-लिखे शातिर देश को बांटने के काम में लगे है और भारत को नेपाल बनाना चाहते है। डॉ. शर्मा ने गरीब और निरीह आदिवासियों के आंदोलन को अनदेखा किए जाने पर  मीडिया पर भी उंगली उठाई। "सलवा जुड़ूम" डाक्यूमेंट्री फिल्म के प्रयास को सराहनीय बताते हुए सृजन गाथा डॉट काम मासिक वेब पत्रिका के संपादक जय प्रकाश मानस ने कहा कि बाजार की समस्या को छोड़ दे तो देश आंतरिक मामलों में शांति व्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं है। कल तक जो नक्सली कल्याण कर सकते थे वे आज आदिवासियों के ही शोषक बन गए   है। "सलवा जुड़ूम ' वृतचित्र में नक्सली आंदोलन की पृष्ठभूमि से लेकर छत्तीसगढ़ की संस्कृति भी शामिल है जो दर्शक में देशराग जगाती है । छत्तीसगढ़ राज्य के आंदोलनकारी दाऊ आनंद कुमार ने रामायण के कथा प्रसंग का हवाला देते हुए कहा कि जैसे सुग्रीव बिना तैयारी के रावण से युद्ध   करने पहुँच गए थे ठीक वैसे ही आदिवासी नक्सलियों के हाथों मारे गए  है। आज जरूरत है इस संघर्ष को मजबूत बनाने की ताकि निरीह आदिवासियों की हत्याओं पर रोक लग सके । भाग्योदय पत्रिका   के संपादक मधुसूदन शर्मा ने कहा कि नक्सली समस्य से निपटने के लिए पिछले सात सालों में क्या पायलेट प्रोजेक्ट सरकार ने बनाया है वह जनता को बताया जाना चाहिए। अभी तक सरकार ने   शिविरों के लिए कितनी धनराशि खर्च की है भी बताया जाना चाहिए ।  रामशरण टंडन ने  इस अवसर पर कहा कि आज नक्सली, व्यापारी, नेताओं और अफसरों के संरक्षक और गरीब आदिवासियों के संहारक बन गए है इस पर चिंतन की आवश्यकता है । भाजपा व्यापारी प्रकोष्ठ के बजरंग खण्डेलवाल ने मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा कि जब से प्रदेश में भाजपा की सरकार बनी है नक्सली का भय जनता में कम हुआ है और नक्सली आतंक अंतिम सांस गिन रहा है।   सलवा जड़ुम एक जन आंदोलन का रूप ले चुका है और ये  जंगल  की ऐसी आग है जो   बुझने वाली नहीं है। साहित्यकार राम पटवा ने सलवा जुड़ुम पर केन्द्रित फिल्म को प्रेरणादायी बताते हुए राज्य की जनजातियों की पीड़ा को आत्मसात करते हुए राज्य सरकार के उन प्रयासों को भी चित्रित किया गया है जिसमें आदिवासियों की सुरक्षा, विकास को भी शामिल किया गया है। फिल्म एक तरह से जनपयोगी और सार्थक मुद्दो को आम लोगों तक पहुंचाने की दिशा में नव-प्रयास है।

 

गोष्ठी में तपेश जैन,हरीश नायक, अनुपम वर्मा किशोर सोनी, जैन, पंकज दोशी आदि उपस्थित थे।

 

संपर्कः लोकमान्य सद्भावना समिति, जैनबाड़ा, बैजनाथ पारा, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत-492001

Design by - Kalpana Informatics,Raipur, India

www.expressiongraphics.net