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 ।।बयान।।

 

पुलिस निर्दोष जनों के प्राण रक्षा हेतु दृढ़ संकल्पित - श्री राठौर

(स्व. राठौर छ.ग. के पुलिस महानिदेशक रहे हैं)

 

व्यवहारकुशल तथा जाबांज इरादों के धनी श्री राठौर का नेतृत्व नक्सल प्रभावित राज्य की शांत फिजां से अपराधियों के कदम उखाड़ देगा तथा क्षेत्र की जनता अमन चैन के तहत जीवन-यापन करते हुए विकास के सोपान तय करेगी -पुलिस के चरमपंथियों के खिलाफ बचाव की मुद्रा में होने संबंधी संशय महज नकारात्मक प्रतिक्रिया है अपितु पुलिस निर्दोष जनों के प्राण रक्षा हेतु दृढ़ संकल्पित है जिसका नाजायज फायदा विघ्नसंतोषी तत्व यदा कदा अपने प्राणों के रक्षार्थ कर लेते हैं जिस मीडिया के एक्सक्लूसिव रिपोर्टिंग हवा दे जाती है।

 

प्रश्न :- पुलिस कर्मियों को माओवाद जैसे वैचारिक आंदोलन के खिलाफ बड़ी लड़ाई लड़ने हेतु वैचारिक तौर पर मानसिक तैयारी किस तरह कराई जाती है?

श्री राठौर :- पुलिस प्रजातंत्र का प्रहरी है यह जनता के जानमाल की रक्षा के लिए सतत कार्यरत है। निर्देशों के पालन हेतु उनसे भारत के संविधान में लिखे गए पुलिस एक्ट रेगुलेशन का अध्ययन कर ली जाती है। प्रशिक्षण के दरम्यान पुलिस अधिकारियों को कानून तथा मौलिक अधिकारों की रक्षा का पूरा ज्ञान दिया जाता है। जिससे कि कर्तव्य बोध का सूत्रपात उनमें होता है तथा इसी तारतम्य में पुलिसकर्मियों को वैचारिक तौर पर सशक्त रखने का कारगर प्रयास कर्तव्यबोध के अंर्तनिहित सारगर्भित तत्वों के द्वारा किया जाता है।

 

प्रश्न :- स्थानीय बोली, भाषा एवं संवाद संप्रेषण की स्थानीय विधा से किस तरह से गैर बस्तरिया पुलिस कर्मियों को अवगत कराया जाता है?

श्री राठौर :- भाषा की समस्या तो गंभीर है किंतु उस क्षेत्र के कर्मचारी भी हैं जिनसे मदद ली जाती है भाषा का समुचित ज्ञान गैर बस्तरिया कर्मचारियों-अधिकारियों को विधिवत कराया जाता है। इसमें विशेष पुलिस अधिकारी जो स्थानीय होते हैं उनके माध्यम से सहयोग प्राप्त कर इस समस्या से छुटकारा पाने हेतु प्रयास किया जाता है। संवाद संप्रेषण की आदिवासी कला अद्भूत है गाने गाकर ढोल नगाड़े से सुर से ताल मिलाकर ये संदेश संप्रेषण का कार्य करते हैं जिसे समझ पाना जरा मुश्किल कृत्य  है।

 

प्रश्न :- नक्सलवाद चरमपंथी लोगों के खिलाफ पुलिस आमतौर पर बचाव की मुद्रा में होती है, क्यों नहीं नक्सलियों को घेरकर हमलाकर मारा जाता है तथा मुठभेड़ के दौरान उन्हें सकुशल भाग निकल जाने हेतु सुरक्षित रास्ता क्यों कर दे दिया जाता है?

श्री राठौर :- वस्तुत: यह सत्य नहीं है पुलिस भी अब आक्रमण कर रही है यद्यपि पुलिस बल प्रयोग में सावधानी बरतती है नक्सली की पहचान मुश्किल काम है उनकी न कोई शकल है न नाम है वे अनाम हैं। बलप्रयोग के दौरान किसी निर्दोष की मौत पुलिस के हाथों न हो जाए इसका ध्यान पुलिस रखती है। बल का प्रयोग केवल अपराधी के खिलाफ हो इसका ध्यान रखा जाता है अतएव पुलिस के बचाव की मुद्रा में रहने का भ्रम उत्पन्न किया जाता है जो कि सच नहीं है। खतरनाक अपराधी की गिरफ्तारी हेतु दबिश देकर आकस्मिक कार्यवाही पुलिस करती है। इस दबिश के दरम्यान अनेक नक्सलवादी गिरफ्तार भी हुए हैं इनके ठिकानों से बम बनाने का तरीका एवं विस्फोटक सामग्री, घुंघरू, प्रतिबंधित साहित्य एवं बड़ी मात्रा में कंडोम आदि जब्त होते रहे हैं।

 

प्रश्न :- नक्सली एवं आम ग्रामीणों की पहचान में भेद पुलिस कैसे कर पाती है?

श्री राठौर :- यह नक्सली समस्या के वजूद की मुख्य वजह है यदि पहचान संभव हो पाती तो काफी पहले ही यह सब नियंत्रित कर दी जाती यही कार्य जटिल है इस दिशा में सतत प्रयास किए जा रहे हैं।

 

प्रश्न :- नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में 'पदस्थापना अथवा नियुक्ति' बतौर सजा परिभाषित की जाती रही है, इस मनोवृत्ति में सुधार की दिशा क्या रही है?

श्री राठौर :- बीबीआर सेन्ड्रोम से पुलिस कार्यकर्ताओं को बचना चाहिए क्योंकि यह बिलासपुर, भिलाई एवं रायपुर में रहने की प्रवृत्ति एक बीमारी का रूप ले चुकी है कर्मठता का विकास व सोच का विस्तार इस प्रश्न का समुचित उत्तर होगा।

 

 

संपर्कः लोकमान्य सद्भावना समिति, जैनबाड़ा, बैजनाथ पारा, रायपुर, छत्तीसगढ़, भारत-492001

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